भारतीय महिला क्रिकेट टीम की तेज़ गेंदबाज़ रेनुका सिंह ठाकुर आज पूरे देश का गर्व बनी हुई हैं। वर्ल्ड कप के फाइनल में जब भारत और साउथ अफ्रीका आमने-सामने हैं, तो हिमाचल प्रदेश के छोटे से गाँव पारसा (रोहरू) में रेनुका का परिवार पूरे जोश और उम्मीद के साथ टीवी स्क्रीन पर नज़रें गड़ाए बैठा है। उनके घर में आज एक ही दुआ चल रही है – “भारत जीते, रेनुका चमके।”

रेनुका के परिवार के सभी सदस्य — माँ, चाचा, चाची, भाई-बहन और गाँव के पड़ोसी — एक साथ टीवी के सामने बैठे हैं। सबकी आँखों में चमक है और होंठों पर एक ही बात — “हमारी बेटी आज देश के लिए खेल रही है।”
माँ सुनीता ठाकुर की प्रार्थना
रेनुका की माँ सुनीता ठाकुर कहती हैं,
“हमने देवी-देवताओं से प्रार्थना की है कि आज भारत जीते। मुझे गर्व है कि मेरी बेटी हमारे छोटे से गाँव से निकलकर पूरे देश का नाम रोशन कर रही है।”
सुनीता जी याद करती हैं कि जब रेनुका छोटी थी, तो उसे क्रिकेट से बहुत लगाव था। घर के बाहर गली में वह लड़कों के साथ खेला करती थी। जब गेंद नहीं होती थी, तो वह कपड़ों से गेंद बनाकर लकड़ी के बल्ले से खेलती थी। खेल के प्रति उसका जुनून देखकर पूरा परिवार हैरान रहता था।
बचपन से ही जज़्बा था
रेनुका के चाचा भूपिंदर ठाकुर ने ही उसकी प्रतिभा को सबसे पहले पहचाना। उन्होंने परिवार को समझाया कि “इस लड़की में दम है, इसे आगे बढ़ने का मौका देना चाहिए।” भूपिंदर जी की मदद से ही रेनुका को धर्मशाला क्रिकेट अकादमी में दाखिला मिला, जहाँ से उसकी असली क्रिकेट यात्रा शुरू हुई।
रेनुका के दूसरे चाचा मोता ठाकुर, जो कि एक सेवानिवृत्त प्रिंसिपल हैं, गर्व से कहते हैं,
“हमने कभी नहीं सोचा था कि हमारे छोटे से गाँव की बेटी इंडिया के लिए वर्ल्ड कप खेलेगी। लेकिन रेनुका ने यह दिखा दिया कि मेहनत और लगन से कुछ भी नामुमकिन नहीं।”
संघर्ष की कहानी

रेनुका की जिंदगी आसान नहीं थी। जब वह सिर्फ तीन साल की थी, तभी उसके पिता केहर सिंह ठाकुर, जो राज्य के सिंचाई और जनस्वास्थ्य विभाग में कार्यरत थे, का निधन हो गया। उस समय परिवार पर मुश्किलों का पहाड़ टूट पड़ा था। लेकिन सुनीता ठाकुर ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने अकेले अपने दम पर रेनुका को पाला और उसे उसके सपनों तक पहुँचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश की।
सुनीता जी कहती हैं,
“हमने कभी पैसों या सुविधाओं की चिंता नहीं की। बस यही चाहा कि मेरी बेटी अपनी राह पर डटी रहे। आज उसकी मेहनत रंग ला रही है।”
गाँव में जश्न का माहौल
पारसा गाँव में आज उत्सव का माहौल है। बच्चे हाथों में झंडे लिए “भारत माता की जय” के नारे लगा रहे हैं। गाँव के बुज़ुर्ग कहते हैं कि रेनुका ने न सिर्फ अपने परिवार बल्कि पूरे हिमाचल का नाम ऊँचा किया है। गाँव के स्कूल में भी बच्चों को आज मैच दिखाया जा रहा है ताकि वे प्रेरणा ले सकें।
रेनुका का प्रदर्शन
वर्ल्ड कप 2025 में अब तक भारत ने सात मैच खेले हैं, जिनमें से पाँच मैचों में रेनुका ने हिस्सा लिया है। उसने इन मुकाबलों में कुल तीन विकेट झटके हैं।
वह पाकिस्तान, इंग्लैंड, न्यूजीलैंड, बांग्लादेश और ऑस्ट्रेलिया जैसी मजबूत टीमों के खिलाफ खेल चुकी है। उसकी गेंदबाज़ी ने कई मौकों पर विपक्षी टीम को परेशानी में डाला है।
रेनुका ने कहा था कि वह अपने हर स्पेल में टीम के लिए बेहतर देना चाहती हैं। उनकी फिटनेस, आत्मविश्वास और समर्पण ने उन्हें टीम का अहम हिस्सा बना दिया है।
माँ-बेटी का सपना
रेनुका की माँ बताती हैं,
“हम दोनों का सपना था कि एक दिन वह इंडिया के लिए खेले। जब उसका नाम पहली बार टीम इंडिया में आया, तो हमारी आँखों में आँसू आ गए थे। आज जब वह वर्ल्ड कप फाइनल में है, तो यह सपना सच हो गया है।”
सुनीता जी ने यह भी कहा कि उन्हें उम्मीद है कि एक दिन रेनुका देश की नंबर वन गेंदबाज़ बनेगी।
रेनुका भी अपनी माँ के संघर्ष को कभी नहीं भूलतीं। वह हमेशा कहती हैं कि “माँ मेरी सबसे बड़ी ताकत है।”
एक छोटे गाँव से देश की शान तक
पारसा जैसा छोटा गाँव, जहाँ शायद ही कोई बड़ा खेल मैदान हो, वहाँ से एक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बनना आसान नहीं। लेकिन रेनुका ने यह साबित कर दिया कि अगर इरादा मजबूत हो, तो रास्ते खुद बनते हैं।
धर्मशाला अकादमी में शुरुआत करने के बाद उन्होंने लगातार मेहनत की, रणजी और घरेलू क्रिकेट में अच्छा प्रदर्शन किया और फिर भारतीय टीम तक पहुँचीं। आज वह उन खिलाड़ियों में से हैं जो अपने प्रदर्शन से युवा पीढ़ी को प्रेरित कर रही हैं।
परिवार की उम्मीदें
फाइनल मैच के दौरान घर में हर गेंद पर साँसें थम जाती हैं। जब भी रेनुका गेंदबाज़ी करती हैं, पूरा घर चिल्ला उठता है — “शाबाश बेटा!”
माँ सुनीता जी हर ओवर के बाद हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना करती हैं, “हे देवता, आज भारत को जीत दिला देना।”
परिवार का कहना है कि चाहे मैच का परिणाम कुछ भी हो, उनके लिए रेनुका पहले ही विजेता है।
निष्कर्ष
रेनुका सिंह ठाकुर की कहानी सिर्फ एक क्रिकेटर की नहीं, बल्कि उस हर लड़की की है जो सपनों को साकार करने की हिम्मत रखती है। उसने दिखाया है कि हालात कितने भी कठिन क्यों न हों, अगर लगन सच्ची हो, तो सफलता ज़रूर मिलती है।
आज जब पूरा देश भारतीय टीम की जीत की दुआ कर रहा है, तब हिमाचल के इस छोटे से गाँव की एक माँ और उसका परिवार गर्व से कह सकता है —
“हमारी बेटी भारत की शेरनी है।”
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