तमिलनाडु में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक माहौल गर्म होता जा रहा है। मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एम.के. स्टालिन ने आज एक सर्वदलीय बैठक बुलाई है, जिसमें मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के मुद्दे पर चर्चा की जा रही है।
यह बैठक सेक्युलर प्रोग्रेसिव एलायंस (Secular Progressive Alliance) के बैनर तले आयोजित की गई है, जिसमें डीएमके के साथ-साथ कांग्रेस, लेफ्ट पार्टियां और अन्य सहयोगी दल भी शामिल हुए। इस बैठक का उद्देश्य है — मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया के समय और तरीके पर पुनर्विचार की मांग।

“हम मतदाता सूची के संशोधन के खिलाफ नहीं, लेकिन यह समय ठीक नहीं” — स्टालिन
बैठक की शुरुआत करते हुए मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने कहा कि सरकार या उनकी पार्टी मतदाता सूची में सुधार के विरोध में नहीं है, लेकिन विधानसभा चुनावों से सिर्फ 9 महीने पहले और उत्तर-पूर्वी मानसून के बीच में इस प्रक्रिया को अंजाम देना “मुश्किल, अव्यवहारिक और लोकतंत्र के लिए खतरनाक” है।
स्टालिन ने कहा,
“हमने बिहार का उदाहरण देखा है, जहां लाखों नाम सूची से हटा दिए गए और बाद में कुछ ही वापस जोड़े गए। जिन लोगों के नाम हटे, उनमें बड़ी संख्या में महिलाएं, अल्पसंख्यक और दलित शामिल थे। तमिलनाडु में हम ऐसा अन्याय नहीं होने देंगे।”
उन्होंने चुनाव आयोग से अपील की कि वह मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाए और किसी भी वैध मतदाता को अधिकार से वंचित न करे।
राहुल गांधी बोले — ‘यह वोट चोरी की साजिश है’
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे पर तीखा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि बिहार में जो कुछ हुआ, वह “वोट चोरी की साजिश” थी और अब वही प्रक्रिया तमिलनाडु में दोहराने की कोशिश की जा रही है।
राहुल गांधी ने कहा,
“बिहार में 64 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए। यह लोकतंत्र पर सीधा हमला है। गरीब, दलित, महिलाएं और अल्पसंख्यक सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। अब यह ‘वोट चोरी अभियान’ तमिलनाडु में लाया जा रहा है।”
उन्होंने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर आरोप लगाया कि दोनों मिलकर विपक्षी वोटरों को कमजोर करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियाँ
बिहार विवाद के बाद कई याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गईं। कोर्ट ने चुनाव आयोग को दो महत्वपूर्ण निर्देश दिए —
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हटाए गए मतदाताओं की पूरी सूची सार्वजनिक करने का आदेश।
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आधार कार्ड को वैध पहचान पत्र के रूप में स्वीकार करने की अनुमति।
लेकिन विपक्ष का कहना है कि चुनाव आयोग ने इन आदेशों का पूरी तरह पालन नहीं किया। इससे मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।
चुनाव आयोग का पक्ष — “यह एक नियमित प्रक्रिया है”
चुनाव आयोग ने अपने बचाव में कहा है कि Special Intensive Revision (SIR) एक नियमित और कानूनी प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य है कि मतदाता सूची “शुद्ध और सटीक” बनी रहे।
आयोग का कहना है कि बिहार में यह प्रक्रिया बिना किसी आपत्ति के पूरी हुई, और अब वही मॉडल तमिलनाडु में अपनाया जा रहा है।
आयोग ने यह भी कहा कि सभी राजनीतिक दलों को सहयोग करना चाहिए ताकि हर योग्य नागरिक का नाम सूची में बना रहे और फर्जी नाम हटाए जा सकें।
AIADMK और BJP ने बैठक से दूरी बनाई
जहाँ डीएमके और उसके सहयोगी दल इस प्रक्रिया का विरोध कर रहे हैं, वहीं विपक्षी AIADMK और BJP ने इस सर्वदलीय बैठक का बहिष्कार किया है।
AIADMK ने बयान जारी करते हुए कहा,
“हम पूरी तरह से SIR का स्वागत करते हैं। डीएमके को 2026 के चुनावों में हार का डर है, इसलिए वे पहले से बहाने बना रहे हैं।”
वहीं BJP ने कहा कि यह प्रक्रिया संवैधानिक अधिकार के तहत आती है और इसमें किसी राजनीतिक साजिश की बात करना “राजनीतिक नाटक” है।
PMK नेता डॉ. अंबुमणि रामदास, जो एनडीए के सहयोगी हैं, ने इस बैठक को “डीएमके और उसके दोस्तों की आंतरिक बैठक” करार दिया।
ग्रामीण इलाकों और गरीबों पर असर की चिंता
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डीएमके और उसके सहयोगियों ने कहा है कि इस प्रक्रिया के तहत लोगों को पुराने मतदाता पहचान पत्र, दस्तावेज़ और फोटो जमा करने होते हैं।
मानसून के मौसम में जब कई इलाके बारिश से प्रभावित हैं, ऐसे में ग्रामीण इलाकों के लोगों के लिए यह प्रक्रिया बेहद कठिन है।
पार्टियों का कहना है कि चुनाव आयोग को राशन कार्ड और आधार कार्ड को पूरी तरह से मान्य दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार करना चाहिए ताकि लोगों को परेशान न होना पड़े।
स्टालिन की अपील — “राजनीति से ऊपर उठकर लोकतंत्र की रक्षा करें”
बैठक के अंत में एम.के. स्टालिन ने सभी दलों से कहा,
“यह मुद्दा सिर्फ डीएमके या विपक्ष का नहीं है। यह तमिलनाडु के हर नागरिक के अधिकार से जुड़ा है। हम सभी को राजनीति से ऊपर उठकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी मतदाता का अधिकार छिने नहीं।”
उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को अपनी प्रक्रिया पारदर्शी बनानी चाहिए और सभी दलों से सुझाव लेने चाहिए।
निष्कर्ष
तमिलनाडु में यह विवाद अब राजनीतिक बनाम लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई बन गया है। एक ओर सरकार और विपक्ष है जो मतदाता सूची में जल्दबाजी से संशोधन को “लोकतंत्र के लिए खतरा” मानते हैं, वहीं दूसरी ओर आयोग और बीजेपी-एआईएडीएमके हैं जो इसे “जरूरी प्रक्रिया” बता रहे हैं।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि चुनाव आयोग इस मुद्दे पर किस तरह का रुख अपनाता है — और क्या तमिलनाडु में मतदाता सूची संशोधन बिना विवाद के पूरा हो पाएगा या नहीं।
FAQ सेक्शन
1. विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) क्या है?
यह चुनाव आयोग की नियमित प्रक्रिया है जिसमें पुरानी सूची से मृत, डुप्लिकेट या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाए जाते हैं और नए पात्र मतदाता जोड़े जाते हैं।
2. डीएमके इसका विरोध क्यों कर रही है?
डीएमके का कहना है कि चुनावों से पहले इस प्रक्रिया को जल्दीबाज़ी में करना गलत है और इससे वैध मतदाताओं के नाम भी हट सकते हैं।
3. क्या सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कुछ कहा है?
हाँ, सुप्रीम कोर्ट ने बिहार मामले में निर्देश दिया था कि हटाए गए मतदाताओं की सूची सार्वजनिक की जाए और आधार को मान्य दस्तावेज़ माना जाए।
4. क्या सभी दल इस बैठक में शामिल हुए?
नहीं, बीजेपी और एआईएडीएमके ने इस बैठक का बहिष्कार किया और चुनाव आयोग के निर्णय का समर्थन किया।
5. आगे क्या होगा?
डीएमके और उसके सहयोगी आयोग से पुनर्विचार की मांग करेंगे। अब यह देखना होगा कि आयोग अपना निर्णय बदलता है या नहीं।
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