धान खरीद नीति पर किसानों का हंगामा — सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप!

बिहार समेत पूरे देश के किसान इन दिनों अपनी फसलों की बिक्री को लेकर गुस्से में हैं। खासतौर पर धान की खरीद नीति को लेकर किसानों का विरोध बढ़ता जा रहा है। उनका कहना है कि सरकार ने वादा किया था कि किसानों को उनके उत्पाद का सही मूल्य मिलेगा, लेकिन अब उन्हें लग रहा है कि यह वादा केवल कागजों तक सीमित रह गया।
सरकार के वादे और किसानों की उम्मीदें
पिछले सालों में जब सरकार ने नई धान खरीद नीति लागू की, तब किसानों को भरोसा दिलाया गया कि उनकी फसल का उचित मूल्य सुनिश्चित किया जाएगा। कहा गया कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर फसल खरीदी जाएगी और किसानों को उनके उत्पाद का सही दाम मिलेगा। इसके अलावा, कई क्षेत्रों में किसानों के लिए फसल बीमा और वित्तीय सहायता के भी वादे किए गए।
किसानों ने इस नीति से बड़ी उम्मीदें बांधी। उन्होंने सोच रखा था कि इस नीति के तहत उनकी मेहनत का पूरा मूल्य मिलेगा और उन्हें अपने परिवार के लिए बेहतर जीवन यापन का अवसर मिलेगा।
हकीकत में क्या हुआ
लेकिन अब किसानों का कहना है कि वादों की हकीकत कुछ और है। कई राज्यों में किसानों की फसल खरीदी सही समय पर नहीं हो रही। MSP की कीमतें घोषित होने के बावजूद किसानों को उनका पैसा मिलने में देरी हो रही है। कुछ क्षेत्रों में तो किसानों को तय मूल्य से कम में ही धान बेचने को मजबूर होना पड़ा।
किसान यह भी कहते हैं कि सरकारी एजेंसियां और स्थानीय अधिकारियों द्वारा फसलों की खरीदी में पारदर्शिता का अभाव है। इससे छोटे और सीमांत किसान सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। वे अपनी फसल को उचित मूल्य पर बेचने के लिए कई बार लंबी दूरी तय करके मंडियों में आते हैं, लेकिन उन्हें अक्सर निराशा ही हाथ लगती है।
किसानों का हंगामा
इन परिस्थितियों में किसान सड़क पर उतर आए हैं। उन्होंने स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार के खिलाफ प्रदर्शन शुरू कर दिया है। बिहार के कई जिलों में किसान संघों और समितियों द्वारा विरोध-प्रदर्शन किए गए। किसानों ने केंद्र और राज्य सरकार से तुरंत हस्तक्षेप करने और उनकी फसलों का सही मूल्य दिलाने की मांग की।
किसान नेताओं का कहना है कि यह केवल किसान ही नहीं, बल्कि पूरे कृषि क्षेत्र की स्थिरता के लिए भी खतरनाक है। यदि किसानों की फसलों का मूल्य समय पर और सही रूप से नहीं दिया गया, तो आने वाले समय में लोग खेती छोड़ सकते हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी गंभीर असर पड़ सकता है।
वादाखिलाफी का आरोप
किसानों का आरोप है कि सरकार ने वादाखिलाफी की है। उन्होंने कहा कि चुनावों और नीतिगत घोषणाओं में किसानों से झूठे वादे किए गए, लेकिन उनके पालन में अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। किसानों का कहना है कि सरकार सिर्फ कागजों पर नीति बनाती है, लेकिन जमीन पर उसे लागू करने में नाकाम रहती है।
इस आरोप के चलते सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ रहा है। विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को उठाया है और कहा है कि किसानों की समस्याओं को हल करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।
किसानों की अपेक्षाएँ
किसानों की मांग है कि:
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धान की खरीदी MSP पर सही समय पर की जाए।
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छोटे और सीमांत किसानों के लिए विशेष प्रावधान किए जाएं।
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मंडियों में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।
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फसल बीमा और वित्तीय सहायता के वादों को लागू किया जाए।
किसानों का कहना है कि अगर इन मांगों को नजरअंदाज किया गया, तो वे बड़े पैमाने पर आंदोलन करने को मजबूर होंगे। उनका विश्वास है कि केवल सख्त प्रदर्शन और आवाज उठाने से ही उनकी समस्याओं का समाधान हो सकता है।
विशेषज्ञों की राय
धान खरीद नीति पर किसानों का हंगामा — सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप!
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि धान खरीद नीति में सुधार की बहुत आवश्यकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को MSP की प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाना चाहिए। साथ ही, खरीदी के समय भुगतान और लॉजिस्टिक में सुधार करना जरूरी है।
विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि किसान तभी खुशहाल रह सकते हैं जब उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिल सके। इसके लिए सरकार और किसान दोनों को मिलकर समाधान ढूंढना होगा।
निष्कर्ष
धान खरीद नीति को लेकर किसानों का हंगामा यह दर्शाता है कि कृषि क्षेत्र में अभी भी कई समस्याएं हैं। वादों और हकीकत के बीच अंतर ने किसानों में असंतोष पैदा कर दिया है। सरकार के लिए यह चुनौती है कि वह किसानों की आवाज सुने और उनके हक के लिए ठोस कदम उठाए।
अगर समय रहते सुधार नहीं हुआ, तो यह केवल किसानों की ही नहीं, बल्कि पूरे देश की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
किसान आज भी उम्मीद के साथ इंतजार कर रहे हैं कि उनकी फसल का सही मूल्य मिले और उन्हें वह सम्मान मिले, जिसके वे हकदार हैं।
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